Thursday, 5 June 2014

संतशिरोमणी श्रीमन्मथस्वामी-विरचित परमरहस्य अध्याय चौदावा


संतशिरोमणी श्रीमन्मथस्वामी

संतशिरोमणी श्रीमन्मथस्वामी-विरचित परमरहस्य


अध्याय चौदावा


।। श्रीगुरुभ्यो नम: ।।
मागील अध्यायाचें अंतीं। पार्वती प्रश्न करी शंकराप्रति। परम संतोषोनि कैलासपति। उपदेश करीतसे।।१।।
देव्युवाच-
स्थलानामंगहस्ताश्च लिंगानि च क्रमेण वै।
अर्पणं तु तथा ब्रूहि प्रकारेण च केन वा।।१।।
देवी म्हणे भक्तस्थळादि करोन। कोण्या लिंगां कोण स्थळ करी पूजन। कोण्या अंगें कोण्या हस्तें कोण मुखेकरोन। कोण विषय अर्पिजें।।२।। ही अर्पणविधि मजलागोन। षडलिंगाचें निरोपावें पूजन। म्हणोनिया वंदिलें चरण। कृपा कीजें स्वामिया।।३।।
शिव उवाच-
चित्तहस्तेन भूम्यंगे भक्तस्याचारलिंगके।
घ्राणे च तन्मुखे गंधं अर्पितं तृप्तिभाग्भवेत्।।२।।
शंकर म्हणे पार्वतीसीं। आधी ऐक भक्तस्थळासीं। तो पुजी कोण्या लिंगासीं। कोण्या पदार्थें।।४।। भूमि-अंगें सुचित्तहस्तें। घ्राणमुखें गंधविषयातें। तृप्त करी आचारलिंगातें। तें भक्तस्थळ जाणिजें।।५।।
माहेश्वरो जलांगे च बुद्धिहस्तेन सद्गुरु:।
जिह्वामुखे रसतत्त्वं अर्पितं तृप्तिभाग्भवेत्।।३।।
जळांगें सुबुद्धिहस्तें। जिव्हामुखें रसविषयातें। तृप्त करी गुरुलिंगातें। तें माहेश्वरस्थळ जाणिजें।।६।।
निरहंकारहस्तेन अनलांगे प्रसादिक:।
शिवलिंगमुखे नेत्रे अर्पितं रूपभोगवान्।।४।।
अनलांगेें निरहंकारहस्तें। नेत्रमुखें रूपविषयातें। तृप्त करी शिवलिंगातें। तो प्रसादी म्हणावा।।७।।
मनोहस्तेन वाय्वंगे प्राणलिंगी तथैव च।
जंगमे त्वङ्मुखेनैव अर्पितं स्पर्शभोगवान्।।५।।
वायु-अंगें सुमनहस्तें। त्वगिंद्रियमुखें स्पर्शविषयातें। तृप्त करी जंगमलिंगातें। तें प्राणलिंगिस्थळ जाणिजें।।८।।
ज्ञानहस्तेन शब्दश्च व्योमांगे तत्प्रसादकम्।
श्रोत्रं च तन्मुखेनैव अर्पितं शब्दभोगवान्।।६।।
व्योमांगें ज्ञानहस्तें। श्रोत्रमुखें शब्दविषयातें। अर्पित करी प्रसादलिंगातें। तें शरणस्थळ जाणिजें।।९।।
आत्मांगे भावहस्तेन ऐक्यं चापि महात्मके ।
प्रणवं हृन्मुखेनैव पदार्थं तृप्तिभाग्भवेत्।।७।।
आत्मांगें भावहस्तें। मानसमुखें प्रणवविषयातें। अर्पण करी महालिंगातें। तें ऐक्यस्थळ जाणिजें।।१०।। ऐसें षडलिंग षडंगेकुन। जाणोनि जो करी आत्मार्पण। तोचि सत्य शिवगण। सत्यशरण बोलिजें।।११।। ऐसिया कळा जाणोन। जो करी सद्भावें पूजन। तो सर्व शिवाचारासीं संपन्न। सत्यशरण वो देवी।।१२।। त्याचें दर्शन स्पर्शन संभाषण। जयासीं घडें भाग्याकुन। तरी निवारे जन्ममरण। कळिकाळ शरण तया।।१३।। तो जयाकडे कृपेनें पाहे। तयासीं सृष्टी सुखाची होय। तो म्हणे मोक्षासीं जेथें राहे। तेथेंचि राहे त्याचे बोलां।।१४।। त्याच्या दासी चारी मुक्ति जाण। अष्ट महासिद्धि येती शरण। परि तो न पाहे तयालागोन। निराश म्हणोनिया।।१५।। ऐसे जे सत्यशरण। तेचि आचारासीं अग्रगण। शिवाचारासीं संपन्न। मुकुटमणि आमुचे।।१६।। तयाचे प्रसादेकरोन। शिवाचार होय पावन। मजहि दैवतपण। तयाचेनि वो देवी।।१७।। मी तरी निर्गुण निराकार। भक्तिप्रेमालागीं झालो साकार। भक्त माझें हृदयींचें जिव्हार। त्याचें साचार ध्यान मज।।१८।। त्याचें सदा मज चिंतन। त्याचें आवडें मज स्मरण। मी न विसंबे एक क्षण। तोहि अर्धपळ न विसंबे।।१९।। तो आत्मा माझा मी त्याचे शरीर। तया मज नाहीं भेदाकार। जैसी गोडी आणि साखर। अभिन्न असे।।२०।। ऐसें ऐकोन पार्वती। महा आनंद पावली चित्तीं। मग आणिक कांहीं विनंती। करिती झाली तें काळीं।।२१।।
देव्युवाच-
चित्तादिसर्वहस्तांना क्रमोत्पत्ति: स्वभावत:।
श्रोतुमिच्छामि स्पष्टं तद् ब्रूहि मे परमेश्वर।।८।।
पार्वती म्हणे शंकरासीं। षड्हस्ताची उत्पत्ति कैसी। कोणापासोन कोणा हस्तासीं। निरोपा स्वामी।।२२।।
शिव उवाच-
वस्तुनो भावहस्तश्च तस्मात् ज्ञानं ततो मन:।
मनासोऽहंकृतिर्जाताहंकृते: बुद्धिरेव च।।९।।
बुद्धेश्चित्तं समुत्पन्नं क्रमशो लघुभावत:।
एतद् हस्तस्य विज्ञानं अतिसूक्ष्मं वरानने।।१०।।
शंकर म्हणे पार्वतीला। वस्तूपासोनि भावहस्त झाला। भावापासोन उत्पन्नला। ज्ञानहस्त तो।।२३।। ज्ञानहस्तापासोन सुमनहस्त झाला। सुमनहस्तीं निरहंकारहस्त झाला। निरहंकारीं सुबुद्धि उत्पन्नला। परंपरेनें।।२४।। एवं षड्हस्ताची उत्पत्ति। निरोपिली असे तुज पार्वती। भावें धरावा सुचित्तीं। निर्णयो हाचि।।२५।।
देव्युवाच-
चित्तादिसर्वहस्तैस्तु षडलिंगानां क्रमेण वै।
कथं वा क्रियते पूजा तद् ब्रूहि परमेश्वर।।११।।
गिरिजेनें शंभूसीं पुसिलें। चित्तहस्तें कोण लिंग अवधारिलें। येणेपरी षडलिंग पुजिलें। कोण लिंग कोण्या हस्तें।।२६।।
शिव उवाच-
चित्तस्याचारलिंगं स्याद् गुरुलिंगं सुबुद्धिन:।
शिवलिंगनिरहंकारो मनोहस्तेन जंगमम्।।१२।।
प्रसादं ज्ञानहस्तेन महालिंगस्य भावकम्।
उति गुह्यतमं ज्ञानं सुसूक्ष्मं श्रुणु पार्वति।।१३।।
शिव म्हणे वो गिरिजे। चित्तहस्तें आचारलिंग अवधारिजें। सुबुद्धिहस्तें गुरुलिंग पुजिजें। पुढारी ऐक।।२७।। शिवलिंग पुजिजें निरहंकारहस्तें। सुमनहस्तें जंगमलिंगातें। ज्ञानहस्तें प्रसादलिंगातें। अवधारिजें।।२८।। भावहस्त महालिंगासीं। तेणें अवधारिजें तयासीं। एवं षड्हस्तें षडलिंगांसीं। अवधारण निरोपिलें।।२९।। हें अंतर्गुह्य माझें ज्ञान। अत्यंत सूक्ष्म प्रमाण। तें तुज केलें निरोपण। तूं भक्तराज म्हणोनिया।।३०।। भक्ति-विश्वासेंविण। हें श्रवणीं न पडें निरोपण। तुझें प्रेम मज म्हणोन। बोधीतसे तुजला हें।।३१।।
देव्युवाच-
किं मिश्रं चित्तबुद्धिश्च किमंहकारमिश्रितम्।
किं मिश्रं ज्ञानभावश्च ब्रूहि मे परमेश्वर।।१४।।
हे षड्हस्त षड्स्थळांसीं। मिश्रित अससी कोण्या पदार्थांसीं। ते निरोपा म्हणे शिवासीं। पार्वती देवी।।३२।।
शिव उवाच-
भाव: पंचसमायुक्तो ज्ञानपंचसमन्वितम्।
मन: पंचसमायुक्तमहंकारस्तथैव च।।१५।।
बुद्धि: पंचसमायुक्ता चित्तं पंचसमन्वितम्।
एकैकं पंचभिर्युक्तं सुसूक्ष्मं कमलानने।।१६।।
ईश्वर म्हणे गिरिजेस। एकेक हस्त पांचापांचास। मिश्रित असे ते सावकाश। निरोपुं ऐक तें।।३३।। ऐक्यस्थळाचा जो भावहस्त। तो पांचाशीं असे मिश्रित। शरणास जो सुचित्तहस्त। तोहि मिश्रित पांचासीं।।३४।। प्राणलिंग अहंकारहस्त। तोहि पांचासीं असे मिश्रित। तैसा प्रसादियाचा निरहंकारहस्त। तो मिश्रित पांचासीं।।३५।। माहेश्वरां सुबुद्धिहस्त। तो पांचासीं असे मिश्रित। भक्तास जो सुचित्तहस्त। तोहि मिश्रित पांचासीं।।३६।। एवं हस्त येरायेरांसीं। मिश्रित असती पांची पांचासीं। ऐकोनि संतोष झाला गिरिजेसीं। मग आणिक प्रश्न करी।।३७।।
देव्युवाच-
सहभाजनस्य के भेदा: का व्याप्ति: परिमाणत:।
एतत् सर्वं समासेन ब्रूहि मे परमेश्वर।।१७।।
गिरिजा म्हणे शंकरासीं। कोण लिंग कोण्या द्वारासीं। कोण्या हस्तें कोण विषयासीं। भोगीत तें निरोपावें स्वामी।।३८।।
शिव उवाच-
घ्राणेनाचारलिंगं तु गंधं गृह्णाति यत् सदा।
जिह्वया गुरुलिंगं हि रसं गृह्णाति तत्त्वत:।।१८।।
चक्षुषा शिवलिंगं तद्रूपं गृह्णाति यत्तथा।
त्वचा जंगमलिंगं च स्पर्शं तदनुभूयते।।१९।।
भक्त भूमि-अंगें सुचित्तहस्तें। घ्राणद्वारें गंधविषयातें। आचारलिंग अर्पणातें। भोक्तव्य होय।।३९।। माहेश्वर आपांगें सुबुद्धिहस्तें। जिव्हाद्वारें रसविषयातें। गुरुलिंग अर्पणातें। भोक्तव्य होय।।४०।। प्रसादी तेजांगें निरहंकारहस्तें। चक्षुद्वारें रूप महाविषयातें। शिवलिंग अर्पणातें। भोक्तव्य होय।।४१।। प्राणलिंगी वायु-अंगें सुमनहस्तें। त्वचाद्वारें स्पर्शविषयातें। जंगमलिंगीं अर्पणातें। भोक्तव्य होय।।४२।।
श्रोत्रेण शब्दो गृह्णाति शरण्यो लिंगमूर्तिक:।
हृदयेन तु महालिंग ओंकारं चापि गृह्यते।।२०।।
शरण नभांगें ज्ञानहस्तें। श्रोत्रद्वारें शब्दविषयातें। प्रसादलिंगीं अर्पणातें। भोक्तव्य होय।।४३।। ऐक्य चिदंगें भावहस्ते। हृदयद्वारें प्रणवविषयातें। महालिंग अर्पणातें। भोक्तव्य होय।।४४।। ऐसें पांच लिंगांचें भोक्तेपण। तुज निरोपिलें विवरोन। आतां महालिंगाचें भोक्तेपण। लक्षण निरोपुं ऐक गिरिजे।।४५।।
उत्येवमाश्रयेणैव महालिंगं सुबुद्धिमान्।
गंधाद्यानंदपर्यंतमनुराददति सर्वदा।।२१।।
ऐसें इंद्रियद्वारें विषय जाण। षडलिंगीं जें जें अर्पण। तें तें भक्तिं महालिंगीं अर्पण। सर्व तोचि म्हणोनि।।४६।। षडलिंगांचा जो विस्तार। तो स्वयें महालिंग साचार। म्हणोनि सर्वभोक्ता परात्पर। तोचि बोलिला असे।।४७।।
लिंगदृष्ट्या दर्शनं स्याल्लिंगहस्तेन स्पर्शनम्।
लिंगश्रोत्रेण श्रोतव्यं लिंगजिह्वारसात्मवान्।।२२।।
लिंगदृष्टीं दृष्टी देखत। लिंगाचे हस्तें देत घेत। लिंगाचे श्रोत्रें ऐकत। म्हणोनि महालिंग भोक्ता।।४८।। लिंगजिव्हें रस चाखत। लिंगाविण कांहीं न चाले पदार्थ। आणिक कांहीं होत जात। ते लिंगाचिये सत्तें।।४९।।
लिंगघ्राणेन घ्राणं तु लिंगेन पदते सह।
लिंगमनुगतं नित्यं येन तत्सहभाजनम्।।२३।।
लिंगाचिये घ्राणें घ्राण। गंधविषय भोगी आपण। लिंगाचें पद ते चरण चालन। लिंगाविण न चले कांहीं।।५०।। लिंगें बोलविल्या वेदु बोले। लिंगें चालविल्या सूर्य चाले। लिंगें हालविल्या वायु हाले। सत्तामात्रें।।५१।। लिंगें रचविल्या ब्रह्मांड रचे। लिंगें खचविल्या सर्व खचे। स्थिति नाद बिंदु कारण रचे। त्याचिया सत्तें।।५२।। क्षितीनें भूतें वाहावीं। पर्वतीं बैसका पाडावी। सागरें सीमा नुल्लंघावी। ही आज्ञा लिंगाची।।५३।। उत्पत्ति करिजें ब्रह्मयानें। प्रतिपाळ कीजें विष्णूनें। संहार कीजें रुद्रानें। सत्तामात्रें लिंगाचिया।।५४।। लिंगापासोन शक्ति झाली। तेव्हां पृथ्वी स्थितीत आली। ब्रह्मा-विष्णु हीं बाळें व्याली। शक्तिसामर्थ्य अद्भुत।।५५।। आतां एक एक काय सांगावें। सर्वचि चाले लिंगसत्ताप्रभावें। एवं महालिंग कर्ता भोक्ता स्वभावें। परि अकर्तृत्व न मोडें।।५६।। जैसे भानूचे सत्तें सर्व चालत। परि तो न करिता करवीत। करवोनि निराळा राहत। त्यापरी अकर्ता तो।।५७।। जैसा कुलालचक्राखालतां। खुंटा असे अकर्ता। सर्व घट होती त्याचिया सत्तां। परि तो उगाचि असे।।५८।। ऐसा महालिंग सर्व भोक्ता कर्ता। चराचर चाले तयाचिया सत्ता। परि तो न लिंपे सर्वथा। अकर्तेपणेचि असे।।५९।। तोचि होय महालिंग। स्वयंभू न चळे अभंग। कर्ताहर्ता होवोन असंग। शक्तिसामर्थ्य तया अंगीं।।६०।। कर्ता असोनि अकर्ता। त्याची असे सर्व सत्ता। तेथें अहंकारें गर्वें वर्ततां। विघ्न प्राप्त तयासीं।।६१।। सर्वत्र लिंगरूपी जाण। तें मी स्वयेंचि झालो आपण। लिंगां मज भिन्नपण। नसे जाण पार्वती।।६२।। त्या लिंगाचे पूर्ण भक्त। ते मला असती आप्त। त्यावेगळा दुजा पुनीत। न मानी मी देवो।।६३।। आपणां तया भेद नाहीं। जैसी भूषणें सुवर्णाठायीं। भानु-किरणां भेद कांहीं। नसे जाण सत्य पैं।।६४।। तंतु आणि वस्त्रास। मृत्तिका आणि घटास। आकाश तैसेचि शब्दास। भेद नाहीं जाण पां।।६५।। तैसा मी लिंगरूपी भक्तहृदयीं। वसे सदा निरालंब तत्त्वाठायीं। लिंगनिष्ठें करोनि कैलासालयीं। अंतीं येतो धांवोनिया।।६६।।
सर्वेंद्रियाणां द्वारैश्च महालिंगेन भुज्यते।
उति यस्य स्थिरा बुद्धि: सहभाज: स उच्चते।।२४।।
सर्व इंद्रियद्वारें भोक्ता। महालिंगचि तत्त्वतां। ऐसा जाणे बुद्धिवंत दाता। तोचि जंगम तोचि भक्त।।६७।। करोनि अकर्ता ही खूण। कळली जया संपूर्ण। तो लिंगचि स्वयें होवोन। असे तोचि जंगम तोचि भक्त।।६८।।
दृष्टाद् दृष्टि: श्रुतात् श्रुतं घ्रातात्घ्रातं तथैव च।
स्पृष्टात्स्पृष्टं तु जानीयाद्रसनाद्रसनं तथा।।२५।।
भुक्तात् भुक्तमाख्यातं तृप्ति चैव तथैव हि।
एक: प्राण: समाख्यात: सदैव सहवर्तिनाम्।।२६।।
दृष्टीनें देखे तें तें जाण। कानीं ऐकें तें तें आपण। घ्राणीं परिमळ घेते जाण कोण। तया लिंगाविना।।६९।। जिव्हेसीं रस घेत। स्पर्शासीं स्पर्शत। तयाविण दुजा नितांत। कोण तो विचारी पां।।७०।। प्रणवादि विषयीं तृप्त होत। तोचि जाणे समस्त। तया लिंगाविण मात। येथ बोलोचि नये।।७१।। ऐसा सर्वत्र लिंग व्यापक जाण। तेंचि तें स्वयें झालें आपण। आपणियां तया भिन्नपण। न देखती कदा।।७२।। आपणियां तया भेद नाहीं। जैसे भूषण सुवर्णाचे ठायीं। भानुकिरणां भेद नाहीं। अंतरीं असें एकचि।।७३।। अथवा तंतु आणि विस्तारां। मृत्तिका आणि धरां। अवकाश आणि अंबरां। भेदु जैसा नाहीं।।७४।। तैसा लिंग आपणियां। अभेद वर्ते निर्माया। तोचि शरण लिंगिया। भक्त अथवा जंगम।।७५।। तरी लिंगस्थिति वर्तती जे। तेणें लिंगचि आपण होईजें। ही स्थिति ऐक वो गिरिजे। निरोपुं तुज।।७६।। लिंग उगेचि असें जैसें। आपणहि उगेचि असिजें तैसें। लिंगासीं चळणवळण नसे। आपण निश्चळ तैसें व्हावें।।७७।। लिंग शांत असे। आपणहि तैसें विशेषें। लिंगासीं बडबड नसे। आपणहि तैसाचि।।७८।। लिंग निराश सर्वारहित। आपणहि निराश निश्चित। लिंग निराभिमानी निर्हेत। आपणहि तैसाचि।।७९।। कोणी म्हणतील आकार आहे। तैसा जरी हाहि होये। तरी जडत्व आलें पाहे। उभय वर्गां।।८०।। ऐसें जें बोलती। तें अज्ञान म्हणिजेती। कां म्हणसी तरी लिंग आकार भाविती। म्हणोनिया।।८१।। जें पातळ तूप तें थिजलें। तरी काय तुपपणा मुकलें। तैसें निराकार आकारलें। लिंग होवोनिया।।८२।। यालागीं लिंग निराकारचि असे। तया आकार प्रकार नसे। दिसे तरी कल्पिला असे। भक्तिसिद्धीसाठीं कीं।।८३।। एवं भक्त आणि देव। उभयां नसे भिन्न भाव। तो भक्तश्रेष्ठ सावेव। लिंग होवोनि ठेला।।८४।। म्हणोनि येरयेरांचे प्राण। एक होवोनि ठेले जाण। लिंग भक्त मिळोन। उभय वर्ग एकचि।।८५।।
हृदयं हृदयं चैव श्रोत्रं श्रोत्रं च सर्वदा।
स्पर्शनं स्पर्शनं चैव दृष्टिर्दृष्टिस्तथा पुन:।।२७।।
जिह्वा जिह्वेंद्रियं ज्ञेयं घ्राणं तद् घ्राणमेव हि।
एकेव प्राणमाख्यातं लिंगेन सहवर्तिन:।।२८।।
आपुलें निजहृदयास। लिंगाचें हृदय असे सावकाश। आपुलिया श्रोत्रांस। श्रोत्र लिंगाचेचि।।८६।। आपुले त्वगिंद्रियासीं जाण। लिंगाचेनि त्वगिंद्रियपण। आपुले चक्षूसीं नेमून। चक्षुपणा तेहि लिंगाचेनि।।८७।। आपुले जिव्हेसीं। लिंगजिव्हा सावकाशी। आपुल्या घ्राणासीं। घ्राण लिंगाचे।।८८।। आपुलिया वाक्यां वाक्यपण। लिंगवाक्यें असें जाण। पाणींद्रियालागोन। पाणींद्रिय लिंगाचें।।८९।। पाद-इंद्रियां पाद-इंद्रिय जाण। लिंगासीं असती आपण। शिश्नासीं शिश्नपण। लिंगनिष्ठें जाण तें।।९०।। गुदासीं गुदपण। ते लिंगगुदें जाण। एवं दश इंद्रियांसीं प्रमाण। लिंग-इंद्रियाचेनि।।९१।। अंत:करणां अंत:करण। लिंगचि असे जाण। मनासीं मनपण। तेंहि लिंगाचेनि मनें।।९२।। बुद्धीसीं बुद्धि जाण। लिंगाची बुद्धि आपण। आपुलें चित्ताचें चित्त नेमून। लिंगाचें चित्त असें।।९३।। आपुल्या अहंकाराचा अहंकार। आपणचि असे लिंगेश्वर। एवं सर्ववर्तमान सर्वेश्वर। भक्तचि होवोनि वसे।।९४।। यालागीं लिंग-इंद्रियाविण। न चालती भक्त-इंद्रियें जाण। म्हणोनि उभय वर्गी भिन्न। म्हणोचि नये।।९५।। एवं उभयतांसीं मिश्रित जाणिजें। आपण या लिंगीं एकत्व कीजें। येरयेरां प्राण मिश्रित होर्उजें। अभिन्नपणें।।९६।। ऐसें आपण तें लिंग लिंग तें आपण। ऐसा आचरे जंगम अथवा भक्त जाण। त्या नांव बोलिजें सर्ववर्तमान। सत्य सत्य वो गिरिजे।।९७।।
लिंगदेही शिवात्मायं लिंगाचारी न लौकिक:।
सर्वलिंगमयं रूपं लिंगेन सह लक्ष्यते।।२८।।
लिंगीं प्राणी शिवरूप होवोनि। लिंगाचे वर्ते आचरणीं। तो लौकिकासीं न मानी जनीं। लिंगध्यानीं लिंगचि तो।।९८।। जो लिंगरूप देखे दृष्टीं सृष्टी। अनंत ब्रह्मांडें लिंगाचे पोटीं। अध: ऊर्ध्व मध्य शेवटीं। लिंगसंपुटीं सर्व देखे।।९९।। लिंगापोटीं सृष्टी म्हणणे। हेंहि बोलणे अवाच्य जाणणें। सृष्टी आणि लिंग दोनपणें। कशासीं भाविजें।।१००।। आघवा लिंगचि कां न म्हणावा। भेद सांडोनि अभेदचि जाणावा। हा निजभक्ति आपुला ठेवा। जाणोनि वर्तती ते।।१०१।। ते आपणियासहित लिंगचि देखती। लिंगरूपचि सर्व सृष्टी भाविती। शिवस्मरणीं शिवरूप होवोनि असती। तयाप्रति महालिंगी बोलिजें।।१०२।। तया आणि महालिंगासीं। भेद नाहीं उभय वर्गासीं। म्हणोनि तोचि महालिंग सर्वांसीं। सर्वभोक्ता होवोनि असे।।१०३।।
इत्थं सर्वं महालिंगं कर्ताभोक्ता प्रकाशक:।
यो हि भेदो न जानाति प्रसादस्तस्य निष्फल:।।२९।।
ऐसा महालिंगचि एक। सर्वत्र तोचि भोक्ता देख। एकावांचोनि आणिक। दुजा नाहीं कोणी।।१०४।। ही खूण न जाणतां पूजा करी। अधोगति जाय तो अवधारी। त्याचा प्रसाद निर्फळ सुंदरी। चुकला निजसुखासीं।।१०५।। एक नेणोनि पूजा करिती। एक अभिमानें तें न पुसती। एक ते अनुमानेंच आचरती। गुरुमुखेंविण।।१०६।। एक देखादेखी करिती। एक दंभास्तव आचरती। यालागीं दु:खातें पावती। जन्ममृत्यूच्या।।१०७।। म्हणोनि संप्रदायमार्गेविण। जें जें कीजें क्रिया-आचरण। तें तें निर्फळ होय जाण। प्रसादिक क्रिया ते।।१०८।। तैसीच दुजी एक गोष्ट। जो स्वपराक्रमें बलिष्ठ। पुजूं पाहातसे गर्विष्ठ। त्याची पूजा निष्फळ होय।।१०९।। आज हें तुजलागीं रहस्य। सांगतो सद्भक्तिवश। गुरुमुखें अर्चिता विशेष। पुण्य घडें तयासीं।।११०।। जैसी पूजा तैसें भजन। आवडी करी प्रेमेंकरून। आळस न करी रात्रंदिन। नामस्मरण शिवाचें।।१११।। प्रेमें टाळी वाजवून। घोषें अंबर गर्जवून। नाचोनि करी भजन। सद्भक्त माझा तो।।११२।। इति श्रीपरमरहस्यसारामृत। शिवगौरीसंवादीं वर्तत। त्याची टीका करोनि प्राकृत। कृतकृत्य मन्मथ।।११३।।
।। इति श्रीपरमरहस्ये हरगौरीसंवादे षडलिंगनिर्णयनिरूपणं नाम चतुर्दशोऽध्याय: समाप्त:।।
श्लोक २९, ओव्या ११३.
अक्षररचना : सौ. उषा पसारकर, सोलापूर

संतशिरोमणी श्रीमन्मथस्वामी-विरचित परमरहस्य अध्याय तेरावा

संतशिरोमणी श्रीमन्मथस्वामी

संतशिरोमणी श्रीमन्मथस्वामी-विरचित परमरहस्य
अध्याय तेरावा
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।। श्रीगुरवे नम: ।।
मागील अध्यायाचे अंतीं। सहा स्थळांची निजस्थिति। ती श्रुत केली देवीप्रति। कृपादृष्टीकरोनि।।१।। आतां पुढें सुरस प्रकार। देवी प्रश्न करील साचार। वीरशैव धर्माचें सार। वारंवार प्रगटवा म्हणोनि।।२।।
देव्युवाच-
मिश्रितं भक्तमाहेशं प्रसादिप्राणगिन:।
शरण्यैक्यं च किं वा स्याद् ब्रूहि मे परमेश्वर।।१।।
पार्वती म्हणे जी शंकरा। हें षट्स्थळ कैसे मिश्रित दातारा। भक्त माहेश्वर प्रसादी येरयेरां। मिश्रित कैसे।।३।। प्राणलिंगी आणि शरण। सहावें ऐक्यस्थळ जाण। हें परस्परमिश्रित त्रिनयन। निरोपिले पाहिजे।।४।।
शिव उवाच-
भक्तो माहेश्वरश्चैव प्रसादी प्राणलिंगक:।
शरण: शिवलिंगैक्य: एक: पंचसु मिश्रितम्।।२।।
शंकर म्हणे वो पार्वती। हें येरयेरां मिश्रित असती। एक एक पांचाप्रति। मिश्रित तें ऐक।।५।। भक्त मिश्रित माहेश्वरस्थळासीं। प्रसादि-प्राणलिंगी यांसीं। तैसाचि शरण आणि ऐक्यासीं। मिश्रित असे भक्तस्थळ तें।।६।। तैसेचि माहेश्वर भक्तस्थळासीं। मिश्रित असे प्रसादि-प्राणलिंगासीं। शरण आणि ऐक्यासीं। मिश्रित माहेश्वर तें।।७।। तैसेंच मिश्रित प्रसादी पांचासीं। भक्त-माहेश्वर-प्राणलिंगी यासीं। शरण आणि ऐक्यासीं। मिश्रित असे प्रसादिस्थळ तें।।८।। तैसेंचि मिश्रित प्राणलिंगी पांचासीं। भक्त-माहेश्वर-प्रसादी यांसीं। शरण्य आणि ऐक्यासीं। प्राणलिंगी मिश्रित असें।।९।। तैसेचि शरण्य मिश्रित पांचासीं। भक्त-माहेश्वर-प्रसादी यांसीं। प्राणलिंगी-शरण्यासीं। ऐक्यस्थल मिश्रित असें।।१०।। ऐसें षट्स्थल मिश्रित येरयेरांसीं। तें निरोपिलें समस्त तुजसी। हें ऐकोनि संतोषिली मानसीं। पुन: प्रश्न करिती झाली आणिक।।११।।
देव्युवाच-
भक्ताद्यैक्यावसानानां स्थलानां क्रमश: प्रभो।
अंगानि तानि सर्वाणि कथयस्व ममानघ।।३।।
पार्वती म्हणे कैलासनाथा। कोण्या स्थळांस कोण अंग निरोपा आतां। म्हणोनि चरणावरी ठेविला माथा। भक्तिभावें करोनिया।।१२।। अंबेचा प्रश्न रहस्य सार। प्रगट करी वारंवार। शंकर सांगे अरुवार। जन-उद्धाराकारणें।।१३।।
शिव उवाच-
अकारोंकारवबयो: सशयोरपि वा पुन:।
भेदो हि नैव विद्येत छथयोर्जययोरपि।।४।।
अंग म्हणिजे अंगचि बोलिजें। अकारा ॐकारा भेद नेणिजें। वकारा बकारा भेद नाहीं जाणिजें। सकारा शकारा भेद नाहीं वो देवी।।१४।। दकारा हकारा भेद नास्ति। जकार यकार नाहीं भेदगति। छकारा थकारा उभयाप्रति। भेद नाहीं वो देवी।।१५।। ऐसे अक्षराचे जाणिजे भेद। जो जाणे तो ज्ञानिया स्वत:सिद्ध। तो वाचितां कथितां ग्रंथप्रबंध। गुंतेचिना कधीं।।१६।। गिरिजेनें षट्स्थळाची अंगे पुसिली। ते निरोपिती आतां चंद्रमौळी। तेंचि श्रोतियांप्रति सुगम बोलीं। निरोपुं आतां।।१७।।
भक्तस्यांगमिदं पृथ्वी जलं माहेश्वरस्य च।
प्रसादिनोऽग्निरंगं स्याद् वायुस्तत् प्राणलिंगिन:।।५।।
आकाश: शरणांगं च ऐक्यस्यात्मा उदीरित:।
एतदंगस्य विज्ञानं सुसूक्ष्मं कमलानने।।६।।
शंभु निरोपी गिरिजेसीं। ऐक वो षट्स्थळाचे अंगासीं। पृथ्वि-अंग भक्तस्थळासीं। निभ्रांत जाण पां।।१८।। जळांग माहेश्वरासीं। तेज तें शोभें प्रसादियासीं। प्राणलिंग तो वायु-अंगेसीं। असतुसे।।१९।। आकाश अंग शरण्यासीं। आत्मत्व अंग ऐक्यासीं। ऐसीं षट्स्थळाची अंगें तुजसी। निरोपिलीं वो गिरिजे।।२०।। इतके ऐकोनि संतोषिली। सद्भावें चरणां लागली। मग काय विनवती झाली। शंकरासीं देवी ती।।२१।।
देव्युवाच-
एतेषां षट्स्थलानां च के वा हस्ता भवंति हि।
हस्तभेदं न जानामि ब्रूहि मे परमेश्वर।।७।।
देवी म्हणे शंकरासीं। निरोपा षट्स्थळाचे हस्तासीं। कोण हस्त कोण्या स्थळांसी। त्यांची नामें कायसी।।२२।।
शिव उवाच-
भक्तं सुचित्तहस्तं च सुबुद्धिश्च महेश्वर:।
प्रसादी निरहंकारं सुमन: प्राणलिंगिन:।।८।।
ज्ञानहस्तं शरणस्य भावमैक्यस्य तन्मतम्।
एते हस्ता: परिज्ञेया: षट्स्थलानां क्रमेण ते।।९।।
शिव म्हणे गिरिजे ऐक। षट्स्थळाचे जे हस्तक। सुचित्तहस्त भक्तासीं देख। शोभतु असे।।२३।। सुबुद्धिहस्त माहेश्वरासीं। निरहंकारीहस्त प्रसादियासीं। सुमनहस्त प्राणलिंगासीं। साजिरा दिसे।।२४।। शरण्यासीं ज्ञानहस्त। भावहस्त ऐक्यासीं निभ्रांत। ऐसे साहि हस्त शोभत। षट्स्थळासीं।।२५।। आधी षट्स्थळाचीं निरोपिलीं अंगे। आतां निरोपिले हस्त तेणेंचि भागे। देवी पुसे षट्स्थळाचीं लिंगें। कोण लिंग कोणासीं।।२६।। अंबेचे प्रश्न असती गहन। परमात्मा स्वयें करीतसें विवेचन। हा संस्कृत संवाद भावेकुन। आणिला प्राकृतीं।।२७।।
देव्युवाच-
भक्तमाहेश्वरादीनां क्रमशो लिंगपूजनम्।
कथ्यतां मे परब्रह्मन् षट्स्थलस्य रहस्यकम्।।१०।।
देवी म्हणे कोण लिंग भक्तासीं। माहेश्वर पुजिजे कोण लिंगासीं। कोण लिंग प्रसादियासीं। प्राणलिंगासीं कोण लिंग।।२८।। कोण लिंग शरण्यासीं। ऐक्यस्थळ वंदी कोण लिंगासीं। हे निरोपा म्हणोनि चरणासीं। पार्वती लागे।।२९।।
शिव उवाच-
भक्तस्याचारलिंगं स्यात् गुरुलिंगं महेशितु:।
प्रसादिन: शिवलिंगं जंगमं प्राणलिंगिन:।।११।।
शरणस्य प्रसादं स्यात् महाqलगं मतं तत:।
ऐक्यस्याच्र्यं विशेषणं स्थलभेदा: प्रकीर्तिता:।।१२।।
शंकर म्हणे वो गिरिजे। भक्तासीं आचारलिंग जाणिजें। गुरुलिंग म्हणिजें। माहेश्वरासीं।।३०।। शिवलिंग प्रसादियासीं। जंगमलिंग प्राणलिंगासीं। प्रसादलिंग शरणासीं। पूज्य असे निजहस्तें।।३१।। महालिंग तें ऐक्यस्थळासीं। ऐसीं स्थळे साहिं लिंगासीं। पुजिती षट्हस्तें नेमेंसीं। तें निरोपिले तुजलागीं।।३२।।
देव्युवाच-
आचारस्य मुखं देवि गुरुलिंगमुखं तथा।
शिवलिंगमुखं चैव चरलिंगमुखं च किम्।।१३।।
प्रसादस्य मुखं किं वा महालिंगमुखं तथा।
इदं सर्वं न जानामि कथयस्व महेश्वर।।१४।।
गिरिजा म्हणे शंकरासीं। कोण मुख आचारलिंगासीं। मुख कोण ते गुरुलिंगासीं। शिवलिंगां कोण पैं।।३३।। चर म्हणती जंगमासीं। कोण मुख असे त्या लिंगासीं। आणिक त्या लिंगस्थितीसीं। निरोपावें।।३४।। प्रसादी आणि महालिंगासीं। मुखें किती निश्चयेसी। किती किती असती कवणासीं। वेगळाली सांगा मज।।३५।।
शिव उवाच-
ज्ञानलिंगमुखं पंच आचारदिकमुच्यते।
षडविधानां तु लिंगानां मुखानि क्रमश: श्रुणु।।१५।।
शंकर म्हणे गिरिजेसीं। पांच पांच मुखें एकएकां लिंगासीं। हें षडलिंग येरयेरासीं। मुखें जाणिजें।।३६।। महालिंग प्रसादलिंग दोन। जंगमलिंग आणि शिवलिंग चार जाण। पांचवें गुरुलिंग नेमून। हीं पांच मुखें आचारलिंगासीं।।३७।।
जंगमं लिंगमाचारं ज्ञानलिंगं प्रसादकम्।
शिवलिंगसमायुक्तं इत्येतद् गुरुलक्षणम्।।१६।।
महालिंग प्रसादलिंग जंगमलिंग। शिवलिंग आणि आचारलिंग। हीं पंचलिंगें चांग। मुखें गुरुलिंगासीं।।३८।।
महालिंगप्रसादं च जंगमाचारमेव च ।
गुरुलिंगमुखं पंच शिवलिंगस्य निश्चितम्।।१७।।
महालिंग प्रसादलिंग। जंगमलिंग गुरुलिंग आचारलिंग। हें पांच शिवलिंगासीं चांग। मुखें शोभती।।३९।।
आचारं ज्ञानलिंगं च गुरुलिंगप्रसादकम् ।
शिवलिंगमुखं पंच चरलिंगस्य तत्त्वत:।।१८।।
महालिंग प्रसादलिंग जाण। शिवलिंग गुरुलिंग गहन। आचारलिंगादि पंच नेमून। मुखें चरलिंगासीं।।४०।।
जंगमं शिवलिंगं च आचारं गुरुज्ञानकम्।
एतत् पंचसमायुक्तं प्रसादं लिंगलक्षणम्।।१९।।
महालिंग-आचारलिंग जाणिजें। शिव-गुरु-जंगमलिंग जें। हीं त्याचीं मुखें बोलिजें। प्रसादलिंगासीं पैं।।४१।।
जंगमं च शिवाचारं गुरुलिंगं प्रसादकम्।
महालिंगस्य एतानि मुखानि मुक्तिदानि तु।।२०।।
आचारलिंग-शिवलिंग-गुरुलिंग जाण। जंगमलिंग-प्रसादलिंग नेमून। हीं महालिंगासीं प्रमाण। पांच मुखें बोलिजें।।४२।। हें षडलिंग येरयेराचीं मुखें। तुज निरोपिली भक्तिप्रेमसुखें। ऐकोनि सुख जाहलें निकें। पार्वतीदेवीसीं।।४३।। म्हणे अजि भाग्य उदयां आलें। जें बहुकाळ होतें लोपलें। तें स्वामीनें बोधिलें। कृपा करोनि मज।।४४।। आजि माझ्या दैवां नाहीं पार। जें स्वमुखें निरोपितसा दातार। आतां कायसा दरार। जन्ममृत्यूचा।।४५।। जन्ममृत्यु येथ केवढीयाचें। कर्तव्य पुसिलें यमकाळाचें। नाम नाहींच संसाराचें। ऐसें केलें कृपाळुत्वें।।४६।। जें जें करितसा निरोपण। तेणें शिवाचार होय संपन्न। जें सत्यशरण शिवाचारासीं पावन। त्याचें हृदयींचें गुज हें।।४७।। जे नर करिती शिवधर्म-आचरण। तयाचें तुटें जन्ममरण। संसाराचें नुरें कारण। शिवपदां योग्य तो।।४८।। जन्ममृत्यूचा दरारा। अशैवालागीं निर्धारा। नेमिले असे यमकिंकरा। शिक्षा द्यावयालागीं।।४९।। वीरशैवाचें मुखीं शिवनाम। वीरशैवां अंग लिंग सम। त्याचे सूक्ष्म धर्म नेम। न कळे इतरांप्रति।।५०।। ते करिती शिवागम श्रवण। तेणें शिवाचार होय संपन्न। स्त्रीपुत्रसेवकांदि जाण। होती निपुण शिवधर्मीं।।५१।। ऐसा शिवाचार जाण। तो ऐकतां परमपावन। जो वर्ते शिवाचारें पूर्ण। उद्धरून जाय तो।।५२।। वीरशैवधर्म परम कठिण। तो न जाणावा इतरासमान। क्रिया शुद्ध परमपावन। असे जाण लिंगधारी।।५३।। लिंगपूजा हाचि नित्य नेम। भक्तिभावें तेचि करी सप्रेम। गुरु लिंग आणि जंगम। त्यातें भजे आवडी।।५४।। पंच शिवलिंगांपासोन। पंचाचार झाले निर्माण। ती लिंगांगी जाणती खूण। इतरां न कळें तत्त्व पैं।।५५।। परि लिंगपुराणाचे ठायीं। रुद्रसृष्टीचें मर्म पाही। उल्लेखिलें असें लवलाही। निजभक्तांकारणें।।५६।। ऐसा शिवाचार जाण। ऐकतां परम पावन। शिवाचारें वर्ततां संपूर्ण। उद्धरता होय जगां।।५७।। मी एकली होईन पावन। त्याचें आश्चर्य स्वामी कोण। परि शिवाचार संपूर्ण। उद्धरता होय।।५८।। मज पुसावया हेंचि कारण। जें मी उद्धरे आणि जग होय पावन। म्हणोनि आणिक प्रेमें प्रश्न। करिती झाली जगदंबा।।५९।।
देव्युवाच-
पंचभूतमयो देह: केन रूपेण चार्पण:।
कस्मिन् लिंगे भवेत् स्पष्टं कथयस्व महेश्वर।।२१।।
गिरिजा म्हणे शंकराप्रति। हे पंचभौतिक शरीर अर्पिती। कोण्या लिंगीं कोण तत्त्व निवेदिती। तें निरोपा स्वामी।।६०।।
शिव उवाच-
आचारस्यार्पिता पृथ्वी गुरुलिंगार्पितं पय:।
शिवलिंगार्पितं तेजो वायुश्च जंगमार्पित:।।२२।।
प्रसादार्पितमाकाशं प्रणवश्च ज्ञानार्पित:।
एतदर्पणसद्भावं दुर्लभं श्रुणु पार्वति।।२३।।
शंभु म्हणे देवी ऐक मात। आचारलिंगासीं पृथ्वी अर्पित। गुरुलिंगां आप निभ्रांत। शिवलिंगीं तेज तें।।६१।। वायु जंगमलिंगीं अर्पण। आकाश प्रसादलिंगीं निवेदन। महालिंगां अर्पिती जाण। प्रणव तो ॐकार।।६२।। ऐसे षडलिंगां षड्तत्त्व अर्पण। याचा भेद जाणे तो ज्ञानिया पूर्ण। त्याचे आम्ही वंदूं चरण। सत्य सत्य वो देवी।।६३।।
विषया: पंचभोगा ये पंचेंद्रियसमन्विता:।
पंचाक्षरे पंचवक्त्रे सद्भावेन समर्पिता:।।२४।।
शब्दस्पर्शरूपरसं गंधश्चापि हि पंचम:।
एतेषामर्पणं नित्यं निष्कामो मुक्तिभाक् नर:।।२५।।
पंचविषयादि भोग जे जे। ते पंचाक्षरी अर्पण कीजें। पंचेद्रियांद्वारें समर्पिजें। पंचलिंगामुखीं।।६४।। पांच इंद्रियेद्वारे पांच विषयांसीं। अर्पी प्रणव सहाव्या लिंगासीं। तेंचि लाधले मुक्तिपदासीं। परि ते दुर्लभ वो देवी।।६५।।
एवं पंचादिकं चैव पंचवक्त्रे समर्पणम् ।
जानाति निर्मलो बुद्धस्तस्य हस्ते शिवं पदम्।।२६।।
एवं पंचविषयादि भोग। पंचमुखीं समर्पिजे चांग। तो ज्ञानिया जाणिजे अभंग। शिवपद प्राप्त तयासी।।६६।। ऐकोन गिरिजे संतोष झाला। अर्पणे प्राप्त होय शिवपदाला। तरी तेंचि पुसे शंकराला। अर्पण ते कैसे।।६७।।
देव्युवाच-
कं लिंगमर्पयेत् को वा विषय: केन हेतुना।
तत्सर्वं क्रमशो देव ब्रूहि मे कृपया शिव।।२७।।
पार्वती पुसे कैलासपति। कोण विषय कोण्या लिंगाप्रति। अर्पिजें कवणे स्थिति। ते निरोपा परमेश्वरा।।६८।।
शिव उवाच-
शब्दं प्रसादलिंगाय चरलिंगाय स्पर्शनम् ।
शिवलिंगाय रूपं तद् गुरुलिंगाय वै रसम्।।२८।।
गंधमाचारलिंगाय महालिंगाय ओं तत:।
एतन्मुखपरिज्ञानं दुर्लभं श्रुणु पार्वति।।२९।।
परमेश्वर म्हणे उमेस। शब्दविषय प्रसादलिंगास। अर्पिजे स्पर्श जंगमलिंगास। शिवलिंगास रूप पैं।।६९।। गुरुलिंगासीं रस। आचारलिंगां सुगंध सुरस। प्रणव तो महालिंगास। समर्पिजे आदरें।।७०।। ऐसे समर्पी जो जाणोनि खूण। तो दुर्लभ वो सत्यशरण। त्याचे अखंड आम्हां ध्यान। त्याचे चरण वंदूं आम्ही।।७१।। ऐसेचि नेमें चालतां। तरी सायुज्य येतसे हातां। दुर्लभ असे आचरतां। वीरव्रत लिंगधारीचे।।७२।।
यदिंद्रियमुखज्ञानं तदिंद्रियमुखेन च।
अन्येंद्रियेण भोक्तव्यं न भवेत् कर्मभेदत:।।३०।।
येथें ज्ञानिया म्हणसी कां स्तविजे। तो योग्यायोग्य जाणे वोजें। जेथीचे भोक्तव्य तेथेंचि देईजें। म्हणोनि धन्य तो।।७३।। आन इंद्रियांचे विषय आनासी। भोक्तव्य नव्हे ते तयासी। ज्याचे विषय ते त्याने त्यासीं। सुखें भोगिजें।।७४।। जैसे अन्य स्थानींचे भूषण। अन्य स्थानीं लेतां अमान्य। स्थानींचे स्थानी शोभायमान। दिसे साजिरे।।७५।। पाहतां तरी एकचि भोक्ता। दुसरा येथ नाहीं तत्त्वतां। परि इंद्रियद्वारे भोक्तव्यतां। भिन्नत्वें भोगी।।७६।। भिन्न भिन्न पदार्थ भोगी। परि ऐक्यत्वें एकाचि अंगी। विषय अनारिसे परि निजांगी। भोक्ता तो एकचि।।७७।। म्हणोनि जेथींचे विषय तेथेंचि भोगिजें। तेथें गुरुचि भोक्ता जाणिजें। म्हणोनि येरायेरां न लाविजें। लावितां विच्छिन्न पडे।।७८।। पुष्पाचा परिमळ नेत्रीं काय घेईजें। मुक्ताफळ चरणीं काय परीक्षिजें। आणि मुखें ऐकिजें। शब्द तो काई।।७९।। काय श्रोत्रें बोलिजें। की हस्तें चालिजें। काय चरणें कीजें। भोजनक्रिया।।८०।। म्हणोन येराची क्रिया येरासीं। न करवे करितां सायासीं। ज्याचें त्यानेंचि कीजें भोक्तां सर्वांसीं। श्रीगुरुनाथ एकचि तो।।८१।।
इंद्रियादिगतं किंचिद्यत्सुखं तत्तुपावनम्।
तत्प्रसादं च भोक्तव्यं तदिंद्रियमुखेन च।।३१।।
इंद्रियद्वारें किंचिन्मात्र सुख। होय ते गुरुचि भोक्ता देख। तो प्रसाद मानिजें विशेख। ऐसा नेम असे।।८२।। परि लिंगमुखें जें होय अर्पण। तोचि प्रसाद बोलिजें नेमून। लिंगमुखेंविण जें होय निवेदन। तो प्रसाद नोव्हे वो देवी।।८३।।
देव्युवाच-
मिश्रितस्य स्वरूपं मे कथयस्व महेश्वर।
परस्परं मिश्रभावं न जानामि सदाशिव।।३२।।
पार्वती म्हणे ईश्वरासीं। ही विषये मिश्रित ती कैसी। कोण विषय कोणासीं। मिश्रित असती।।८४।।
शिव उवाच-
शब्दं पंचसमायुक्तं स्पर्शं पंचसमन्वितम्।
रूपं पंचसमाख्यातं रस: पंचसमन्वित:।।३३।।
गंध: पंचसमायुक्त: मिश्रितस्तत्त्वत: श्रुणु।
यथा द्रव्यमुखं ज्ञात्वा अर्पणं तत्तु दुर्लभम्।।३४।।
शंकर म्हणे देवीसीं। एक एक मिश्रित पांचासीं। ऐसें मिश्रित येरयेरांसीं। असती वो देवी।।८५।। हें मिश्रित मुखें जाणोन। जो करी आत्मार्पण। तो ज्ञानिया दुर्लभ जाण। सत्यशरण वो देवी।।८६।।
देव्युवाच-
कानींद्रियाणि केभ्यश्च लिंगेभ्य: क्रमतोऽर्पयेत्।
निर्णयं श्रोतुमिच्छामि सुस्पष्टं भगवन् वद।।३५।।
पार्वती म्हणे शंकरासीं। कोण इंद्रिय कोण लिंगासीं। अर्पित निरोपा भेदासीं। कैसा निर्णयो देवा।।८७।।
शिव उवाच-
श्रोत्रेंद्रियसमायुक्तं प्रसादं लिंगमेव च।
त्वगिंद्रियमुखं ज्ञेयं जंगमस्य तथैव हि।।३६।।
नेत्रेंद्रियमुखं तस्य शिवलिंगस्य तन्महत्।
हृदिंद्रिय मुखं चैव महालिंगस्य वै तथा।।३७।।
हे पार्वती ऐक वोजें। श्रोत्रेंद्रिय प्रसादलिंग बोलिजें। त्वगिंद्रिय जंगम जाणिजें। चक्षु शिवलिंग तें।।८८।। जिव्हेसीं गुरुलिंग जाणिजें। घ्राणासीं आचारलिंग ओळखिजें। मानस हृदयलिंग जाणिजें। तें महालिंग असे।।८९।। षडलिंग षडिंद्रियमुखें। षडविषय भोगिती सुखें। षट्स्थळासीं भोक्तव्य निकें। प्रसादमुखें तेवि।।९०।।
हृदिंद्रियमुखं ज्ञात्वा ऐक्यमेव प्रसादवान्।
श्रोत्रेंद्रियमुखं ज्ञात्वा शरणस्तुप्रसादभाक्।।३८।।
त्वqगद्रियमुखं ज्ञात्वा प्राणलिंगी प्रसादवान्।
नेत्रेंद्रियमुखं ज्ञात्वा प्रसादी स्यात् प्रसादभाक्।।३९।।
या षड्इंद्रियामुखेंकरोन। प्रसादभोग जाणे तो प्रसादिया पूर्ण। मानस इंद्रियाचें मुखें जाणें तो जाण। ऐक्यस्थळ बोलिजें।।९१।। श्रोत्रमुखें जाणोन शब्दातें घेणें। तया शरणस्थळ-प्रसादी म्हणणें। त्वगिंद्रियमुखीं स्पर्श सेवणें। तो प्राणलिंगि-प्रसादी बोलिजें।।९२।। चक्षुरिंद्रियमुखें जाणोनि रूप घेणें। तया प्रसादिस्थळ-प्रसादी म्हणणें। ही खूण सत्यशरणचि जाणे। जो शिवाचारासीं अग्रगणीं।।९३।।
जिह्वेेंद्रियमुखं ज्ञात्वा तत्प्रसादी महेश्वर:।
घ्राणेंद्रियमुखं ज्ञात्वा तथा भक्त:प्रसादवान्।।४०।।
जिव्हेंद्रियमुखें जाणोनि रस घेणें। तया माहेश्वरस्थळ-प्रसादी म्हणणें। घ्राणमुखें जाणोन गंध सेवणें। तया भक्तस्थळ-प्रसादी बोलिजें।।९४।। आतां षट्स्थळ षडलिंगासीं। कोण्या अंगें कोण्या हस्तें कोण विषयासीं। कोण तृप्ति करी कोण्या लिंगासीं। ही खूण पुसो म्हणे देवी।।९५।। ऐसा पार्वतीप्रति शंकर। भक्ति ज्ञान सांगे आचार। जें ऐकतां वीरशैव एकाग्र। प्राणी पावन होती पैं।।९६।। इति श्रीपरमरहस्यसारामृत। शिवगौरीसंवादीं वर्तत। त्याची टीका करोनि प्राकृत। कृतकृत्य मन्मथ।।९७।।
।। इति श्रीपरमरहस्ये हरगौरीसंवादे षडलिंगनिर्णयनिरूपणं नाम त्रयोदशोऽध्याय: समाप्त:।।
श्लोक ४०, ओव्या ९७.
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अक्षररचना : सौ. उषा पसारकर, सोलापूर